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प्यारी पत्नी पर कविता – Poem On Wife in Hindi – जीवनसाथी कविता

Poem On Wife in Hindi – पत्नी जिसको हम अपना जीवन कह सकते है, क्यूंकि शादी के बाद पत्नी ही होती है जो पति का ख्याल रखती है और जीवन भर साथ देती है | इसलिए पति को अपनी पत्नी को परमेश्वर मानना चाहिए, अगर आप अपनी पत्नी से बेइंतहा मोहब्बत करते है और उसके लिए कविता संग्रह देख रहे है तो आप सही जगह है यहाँ से आप मेरी प्यारी पत्नी कविता, Poem On Wife in Hindi, पत्नी पर हास्य कविता, पत्नी प्रेम कविता, जीवनसाथी कविता आदि का बेहतरीन संग्रह पेश करेंगे जिन्हे आप Whatsapp, facebook आदि की मदद से अपनी पत्नी के शेयर साथ शेयर कर सकते है |

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प्यारी पत्नी पर कविता

मैं होठों पर जीभ
फेरता हूँ बार-बार
जाने कहाँ से उग आती है पपड़ियाँ
माथे पर चुह्चुहाने लगता है पसीना
सिर्फ कुछ पल गर्म चूल्हे के पास
अपने को पाता हूँ अकेला –
निपट अकेला
चारों तरफ डिब्बों और बर्तनों की भीड़
जैसे कई बरसों से पका रहा हूँ रोटियाँ
जैसे यह गुँथा आटा
कभी होने को नहीं खत्म
जैसे मांजने हों
बेसिन में पड़े अनगिनत
जूठे बर्तन…माँ बरसों से यही कर रही है…
पत्नी भी माँ की तरह

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पत्नी पर हास्य कविता

दोस्त की नई पत्नी के गाल पर मुँहासे हैं
शेव के लिए उठते हुए सोचता हूँ
दोस्त की दाम्पत्य-प्रतिभा
खिड़की से दोस्त सपत्नीक हिला कर जाता है हाथ
प्रसन्नता में प्रसन्न है दोस्त की नई पत्नी का गाल
कि उसके मुँहासों से कोई बाधा नहीं
मेरी शेव में

Poem On Wife in Hindi

यदि ईश्वर में विश्वास न हो,
उससे कुछ फल की आस न हो,
तो अरे नास्तिको! घर बैठे,
साकार ब्रह्‌म को पहचानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!वे अन्नपूर्णा जग-जननी,
माया हैं, उनको अपनाओ।
वे शिवा, भवानी, चंडी हैं,
तुम भक्ति करो, कुछ भय खाओ।
सीखो पत्नी-पूजन पद्धति,
पत्नी-अर्चन, पत्नीचर्या
पत्नी-व्रत पालन करो और
पत्नीवत्‌ शास्त्र पढ़े जाओ।
अब कृष्णचंद्र के दिन बीते,
राधा के दिन बढ़ती के हैं।
यह सदी बीसवीं है, भाई !
नारी के ग्रह चढ़ती के हैं।
तुम उनका छाता, कोट, बैग,
ले पीछे-पीछे चला करो,
संध्या को उनकी शय्‌या पर
नियमित मच्छरदानी तानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो।

तुम उनसे पहले उठा करो,
उठते ही चाय तयार करो।
उनके कमरे के कभी अचानक,
खोला नहीं किवाड़ करो।
उनकी पसंद के कार्य करो,
उनकी रुचियों को पहचानो,
तुम उनके प्यारे कुत्ते को,
बस चूमो-चाटो, प्यार करो।
तुम उनको नाविल पढ़ने दो
आओ कुछ घर का काम करो।
वे अगर इधर आ जाएं कहीं ,
तो कहो-प्रिये, आराम करो!
उनकी भौंहें सिगनल समझो,
वे चढ़ीं कहीं तो खैर नहीं,
तुम उन्हें नहीं डिस्टर्ब करो,
ए हटो, बजाने दो प्यानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!

तुम दफ्तर से आ गए, बैठिए!
उनको क्लब में जाने दो।
वे अगर देर से आती हैं,
तो मत शंका को आने दो।
तुम समझो वह हैं फूल,
कहीं मुरझा न जाएं घर में रहकर!
तुम उन्हें हवा खा आने दो,
Tum उन्हें रोशनी पाने दो,
तुम समझो ‘ऐटीकेट’ सदा,
उनके मित्रों से प्रेम करो।
वे कहाँ, किसलिए जाती हैं-
कुछ मत पूछो, ऐ ‘शेम’ करो !
यदि जग में सुख से जीना है,
कुछ रस की बूँदें पीना है,
तो ऐ विवाहितो, आँख मूँद,
मेरे कहने को सच मानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो।

मित्रों से जब वह बात करें,
बेहतर है तब मत सुना करो।
तुम दूर अकेले खड़े-खड़े,
बिजली के खंबे गिना करो।

तुम उनकी किसी सहेली को
मत देखो, कभी न बात करो।
उनके पीछे उनके दराज से
कभी नहीं उत्पात करो।
तुम समझ उन्हें स्टीम गैस,
अपने डिब्बे को जोड़ चलो।
जो छोटे स्टेशन आएं तुम,
उन सबको पीछे छोड़ चलो।
जो सँभल कदम तुम चले-चले,
तो हिन्दू-सदगति पाओगे,
मरते ही हूरें घेरेंगी,
तुम चूको नहीं, मुसलमानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!

तुम उनके फौजी शासन में,
चुपके राशन ले लिया करो।
उनके चेकों पर सही-सही
अपने हस्ताक्षर किया करो।
तुम समझो उन्हें ‘डिफेंस एक्ट’,
कब पता नहीं क्या कर बैठें ?
वे भारत की सरकार, नहीं
उनसे सत्याग्रह किया करो।
छह बजने के पहले से ही,
उनका करफ्यू लग जाता है।
बस हुई जरा-सी चूक कि
झट ही ‘आर्डिनेंस’ बन जाता है।
वे ‘अल्टीमेटम’ दिए बिना ही
युद्ध शुरू कर देती हैं,
उनको अपनी हिटलर समझो,
चर्चिल-सा डिक्टेटर जानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो।

मेरी प्यारी पत्नी कविता

कभी-कभी
पत्नी को देखता हूँ
जैसे देखता हूँ बहन को
चाहता हूँ लगा दूँ एक आलपिन
फिसलते दुपट्टे पर
कालेज-बैग तैयार कर छोड़ आऊँ चौराहे से पार…

कभी-कभी
उससे लिपटते हुये
भर जाता हूँ एहसास तक
और उसके सीने में दुबके हुये
याद आ जाती है माँ…

कभी-कभी
वह बेतहाशा चूमती है फेरती है हाथ
जैसे में अभी-अभी किसी
हादसे से बचकर आया होऊँ…

कभी-कभी
जब वह सो रही होती है मेरे बगल में
तब निहारता हूँ उसके चेहरे को
निहारता हूँ जैसे माँ को या
सोयी हो जैसे छोटी बहन…

पत्नी प्रेम कविता

बात बहुत छोटी-सी बात से
हुई थी शुरू
इतनी छोटी कि अब याद तक नहीं
लेकिन बढ़कर हो गई तब्दील
अबोले मेंसंवादों की जलती-बुझती रोशनी हुई फ्यूज़
और घर का कोना-कोना
भर गया खामोश अंधकार से

जब भी होता है अबोला
हिलने लगती है गृहस्थी की नींव
बोलने लगती हैं घर की सभी चीजें
हर वाक्य लिपटा होता है तीसरी शब्द-शक्ति से
सन्नाटे को तोड़ती हैं चीजों को ज़ोर से पटकने की आवाज़ें
भेदने पर इन आवाज़ों को
खुलता है–भाषा का एक समूचा संसार हमारे भीतर

सहमा हुआ घर
कुरेदता है दफन कर दिये उजले शब्दों को

कहाँ बह गई सारी खिलखिलाहट
कौन निगल गया नोंक-झोंक के मुस्काते क्षण
कैसे सूख गई रिश्तों के बीच की नमी
किसने बदल दिया हरी-भरी दीवारों को खण्डहर में
अबोले का हर अगला दिन
अपनी उदासी में अधिक भयावह होता है

दोनों पक्षों के पूर्वज
खाते हुए गालियाँ
अपने कमाए पुण्य से
निःशब्द घर को असीसते रहते हैं .

कॉलबेल और टेलीफोन बजते रहते
लौट जाते आगंतुक बिना चाय-पानी के

बिला वजह डाँट खाती महरी
चुप्पी टूटती तो केवल कटाक्ष से
‘भलाई का तो ज़माना नहीं’
या
‘सब-के-सब एक जैसे हैं’ जैसे बाण
घर की डरी हुई हवा को चीरते
अपने लक्ष्य की खोज में भटकते हैं

उलझी हुई है डोर
गुम हो चुके सिरे दोनों
न लगाई जा सकती है गाँठ
फिर कैसे बुहारा जाएगा इस मनहूसियत को
घर की दहलीज से एकदम बाहर
अब तो बरदाश्त भी दे चुकी है जवाब !

इस कविता के पाठक कहेंगे
… यह सब तो ठीक
और भी क्या-क्या नहीं होता पति-पत्नी के इस अबोले में
फिर जितना आप खींचेंगे कविता को
यह कुट्टी रहेगी जारी

तो ठीक है
ये लो कविता समाप्त !.

पत्नी के लिए कविता

मुझ से बेहतर जानती है
रोटियाँ पकाने वाली औरत
भूख का व्याकरण
प्यार की वर्णमालाबाजार जाते समय
जब सजा रही होती हैं अपनी अँगुलियाँ
वह सोच रही होती है तब
आग और लोहे के रिश्ते के बारे में

बच्चों के घर लौटने पर
सब से अधिक खुश नज़र आती है
रोटियाँ पकाने वाली औरत
जब कभी बज उठती है काँसे की थाली
घर के अन्दर
वह भूल जाती है सभी कुछ
दौड़ पड़ती है एकाएक
थाली की आवाज़ रोकने
कड़ाके की सर्दी में
जब दुबके होते हैं हम मोटी रजाई में
रोटियाँ पकाने वाली औरत
पका रही होती है गर्म रोटियाँ

फूलो के पौधों को सींचते हुए
वह माँगती है अपने लिए थोड़ी-सी हरियाली
पसार सके अपने पैर
उगा सके फूल
रोप सके तुलसी का नन्हा-सा पौधा

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